लघु उद्योग क्या है ? उसका परिचय एवं कार्य क्षेत्र व सहायक संस्थान

किसी भी देश के औद्योगिक विकास में लघु उद्योग का स्थान महत्वपूर्ण होता है बेरोजगारी और अर्द्ध बेरोजगारी जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए और साथ ही अविकसित क्षेत्रों में व्यापक औद्योगीकरण के लिए लघु उद्योग को विकसित करना आवश्यक है।

लघु उद्योग की सफलता मुख्य रूप से ऐसे क्षेत्रों पर निर्भर करती है जहां पर्याप्त मात्रा में विद्युत व्यवस्था, जल व्यवस्था, पक्की सड़कें, परिवहन सुविधा, कुशल श्रमिक, विपणन संबंधित सुविधाएं आदि आधारभूत सुविधाएं ही औद्योगीकरण को सफल बना सकती हैं

देश के विभिन्न राज्यों में लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देने की कई योजनाएं मौजूद है और सभी राज्य अपने राज्यों में लघु उद्योगों को सुविधाएं भी प्रदान करते हैं

laghu udyog

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लघु उद्योग की परिभाषा व कार्य क्षेत्र

31 अक्टूबर 1966 में बने नियम अनुसार लघु उद्योगों के अंतर्गत वे सभी औद्योगिक इकाइयां आती हैं जिन्मे 10 लाख रुपए तक की पूंजी लगाई गई हो, चाहे उसकी इकाई में काम करने वाले व्यक्तियों की संख्या कितनी ही क्यों ना हो, इस प्रयोजन से पूंजी का अभिप्राय केवल उत्पादक संयंत्र और मशीनों व संपत्ति में लगी पूंजी से होगा

लेकिन 21 मई 2020 में इसमें संशोधन हुआ और इस संशोधन के अनुसार भारत के सभी राज्यों में स्थापित सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को विनिमय एवं सेवा के क्षेत्र में विभाजित नहीं किया गया है बल्कि दोनों क्षेत्रों के लिए निवेश एवं वार्षिक टर्नओवर तय किए गए हैं

  • एक ऐसा उद्योग जिसमें 1 करोड़ रुपए या इससे कम का निवेश हुआ हो और उसका टर्नओवर 5 करोड़ रुपए तक हो सूक्ष्म उद्योग की श्रेणी में आएगा
  • ऐसा उद्योग जिसमें निवेश 1 करोड़ रुपए से अधिक एवं 10 करोड़ रुपए से कम हुआ हो और उसका टर्नओवर 5 करोड़ से अधिक एवं 50 करोड़ से कम हो लघु उद्योग की श्रेणी में आएंगे
  • एसे उद्योग जिनका निवेश 10 करोड़ से अधिक एवं 20 करोड़ से कम हो और उसका टर्नओवर 50 करोड़ से अधिक एवं 100 करोड़ से कम हो मध्यम उद्योग की श्रेणी में आएंगे

इस व्यवस्था को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मैन्युफैक्चरिंग एवं सर्विस के क्षेत्र में

श्रेणी सूक्ष्म उद्योग 
(MICRO)
लघु उद्योग
 (SMALL)
मध्यम उद्योग
(MEDIUM)
निवेश1 करोड़ ₹ तक 10 करोड़ ₹ तक50 करोड़ ₹ तक
टर्नओवर5 करोड़ ₹ तक50 करोड़ ₹ तक250 करोड़ ₹ तक
MINISTRY OF MICRO, SMALL & MEDIUM ENTERPRISES

लघु उद्योग और भारतीय अर्थव्यवस्था

सूक्ष्म या कुटीर, लघु व मध्यम वर्ग के उद्योग भारत के सभी राज्यों में बड़े उद्योगों के मुकाबले अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं लघु उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार ने राज्य सरकारों की मदद से निम्न योजनाएं चलाई हैं जिनका आने वाले समय में इन क्षेत्र में अच्छे परिणाम देखे जा सकते हैं

सरकार द्वारा लघु उद्योग को प्रोत्साहन देने के लिए चलाई जा रही योजनाएं

  • प्रधानमंत्री एंप्लॉयमेंट जनरेशन प्रोग्राम
  • प्रधानमंत्री मुद्रा योजना
  • उद्योग क्रेडिट कार्ड योजना
  • प्रधानमंत्री रोजगार योजना
  • प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम
  • क्रेडिट लिंक कैपिटल सब्सिडी स्कीम

लघु उद्योगों से लाभ

  • लघु उद्योग को शुरू करने में कम पूंजी की आवश्यकता होती है अर्थात कम पूंजी निवेश के साथ भी आप लघु उद्योग की स्थापना कर सकते हैं
  • वित्त संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए ऋण व सब्सिडी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं
  • मशीनों व उपकरणों की खरीदी पर भी सरकार आरक्षण द्वारा सब्सिडी प्रदान की जाती है
  • घरेलू मांग में वृद्धि करके आर्थिक विकास भी संभव है
  • लघु उद्योग के लिए आरक्षण की सुविधा भी उपलब्ध है
  • विश्व के बाजारों में यदि भारतीय उत्पाद की मांग बढ़ती है तो निर्यात भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है
  • लघु उद्योग खोलने के लिए सरकार आपको प्रोत्साहित करती है साथ ही सभी योजनाओं का लाभ भी उपलब्ध कराती है
  • सामान्यतः लघु उद्योग स्थापित करने के लिए मशीनें, कच्चा माल, मजदूर व अन्य इनपुट सस्ती दरों पर स्थानीय क्षेत्रों से भी उपलब्ध हो जाते हैं
  • स्थानीय रहवासी को काम मिलता है तो वह कम पारिश्रमिक में ही कार्य करने को तैयार हो जाते हैं

भारत में लघु, मध्यम, गृह व कुटीर उद्योगों की सहायता करने वाले संस्थान

1. लघु उद्योग विकास संगठन – Small Industries Development Organization (SIDO)

लघु उद्योग विकास संगठन क्या है?

लघु उद्योग विकास संगठन की स्थापना केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा स्थापित उद्योगों के विकास के लिए तथा उद्योगों के विकास संबंधित कार्यक्रमों की आवश्यकता की पूर्ति हेतु की गई थी, तभी से लघु उद्योगों का बड़ा तेजी से विकास हुआ है आज देश में 4,00,000 से अधिक पंजीकृत लघु उद्योग इकाइयां कार्य कर रही हैं और इतनी ही संख्या में कुछ ऐसी इकाइयां हैं जो पंजीकृत नहीं है.

लघु उद्योग विकास संगठन की स्थापना

भारत सरकार द्वारा 1950 में लघु उद्योग कार्यक्रम तैयार किया गया लेकिन लघु उद्योग विकास संगठन की स्थापना 1953 में की गई, इस संगठन की स्थापना केंद्र सरकार द्वारा, गृह एवं लघु उद्योगों को सभी प्रकार की सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी.

भारत सरकार ने लघु उद्योग की नीति बनाने, नीतियों का प्रचार प्रसार करने और लघु उद्योग के विकास के लिए एक नोडल (Nodel) मंत्रालय के रूप में 14 अक्टूबर 1999 को लघु उद्योग क्षेत्र की समस्याओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए लघु उद्योग मंत्रालय और कृषि एवं ग्रामीण उद्योग को शामिल किया गया.

लघु उद्योग और कृषि एवं ग्रामीण उद्योग मंत्रालय को 1 सितंबर 2001 को अलग करके दो प्रथक मंत्रालय 1. MSME (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्रालय ) 2.(कृषि एवं ग्रामीण उद्योग मंत्रालय) बनाए गए.

इस संगठन के अंतर्गत नई दिल्ली संघीय राज्य क्षेत्र में एक एवं अन्य विभिन्न राज्यों में लघु उद्योग सेवा संस्थान स्थापित किये गए जिनमे 15 शाखा संस्थान एवं 53 छोटे वर्कशॉप (विस्तार केंद्र) शामिल हैं

लघु उद्योग विकास संगठन के कार्य

लघु उद्योग विकास संगठन उद्यमियों को उद्योग सम्बंधित निन्म कार्यो में सहायता प्रदान करता है 

  • उद्योग के चयन करने में
  • उचित दामों पर भूमि की खरीदी में
  • उद्योग के लिए सही प्रकार से भवन निर्माण में
  • मशीनों का चयन, खरीदी, सेटिंग, मैंटेनैंस में
  • उत्पादों का निर्माण, विक्रय, भंडारण, पैकेजिंग, मार्केटिंग, प्रमोशन आदि

उपरोक्त सभी कार्यो की संपूर्ण जानकारी प्रदान करने के साथ ही समय-समय पर संगठन के द्वारा नवीन तकनीकी जानकारी देने के लिए विशेष कार्यशालाओ का आयोजन किया जाता है एवं उद्योगों की सहायता करने वाले सभी संगठनों के बारे में हर प्रकार की जानकारी और मार्गदर्शन लघु उद्योग विकास संगठन के द्वारा दी जाती है

छोटे व निम्न वर्ग के उद्योगों की विशेष सुविधा के लिए वह नया उद्योग लगाने के लिए हर प्रकार की सहायता व मार्गदर्शन इनके द्वारा दिया जाता है साथ ही स्थापित उद्योगों की समस्याओं के समाधान में भी सहायता प्रदान करते हैं

लघु उद्योग विकास संगठन के द्वारा स्वयं उद्योगों को कोई ऋण नहीं दिया जाता है

लघु उद्योग विकास संगठन के अन्य कार्य

मुख्य रूप से लघु उद्योग विकास संगठन नए और पुराने उद्योगों को तकनीकी ज्ञान उपलब्ध करवाता है, संगठन के सहायता कार्यक्रम में यह शामिल है, लघु उद्योग क्षेत्र के अंतर्गत शुरू किए जा सकने वाले सभी उद्योगों की समस्याओं को दूर करने के लिये उचित जानकारी प्रदान करना जैसे :

  • विभिन्न वस्तुओं के निर्माण की तकनीक की योजना तैयार करना
  • तकनिकी परामर्श सेवाएं
  • सुविधाएं तथा विस्तार सेवाएं प्रदान करना
  • प्रबंध एवं तकनीकी व्यवस्थाओं में प्रशिक्षण देना
  • मशीनें खरीदने तथा रख रखाव में मदद करना
  • आधुनिकीकरण तथा प्रौद्योगिकी कार्य विकास में सहायता देना
  • कारखानों के लिए स्थान की व्यवस्था करना
  • उद्यमियों का मार्गदर्शन करना इत्यादि

लघु उद्योग विकास संगठन ने अपने गहन अभियानों के माध्यम से निर्माण उद्यमकर्ता तैयार करने के कार्यक्रम के द्वारा देश के इस महत्वपूर्ण साधन को जुटाने में बड़ा योगदान दिया है साथ ही इस संगठन ने देश में फैले लघु उद्योग सेवा संस्थानों के द्वारा सूक्ष्म प्रशिक्षण देने के अपने व्यापक कार्यक्रम के माध्यम से उद्यमकर्ता तैयार करने की प्रक्रिया जारी की है जो कि काफी सराहनीय है

2. राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम – National Small Industries Corporation (NSIC)

राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम की स्थापना केंद्र सरकार द्वारा की गई है यह निगम लघु उद्योग की मशीनें व उपकरणों को खरीदने में मदद करता है किंतु मशीन का चुनाव उद्यमी का स्वयं का होता है

लेकिन मशीनों का आर्डर व पेमेंट निगम द्वारा ही किया जाता है, पुरानी मशीनों की खरीद व 20,000 से कम कीमत की मशीन पर निगम द्वारा कोई सहायता नहीं दी जाती है

राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम के उद्देश्य

  • यह निगम नगद ऋण उपलब्ध न कराते हुए मशीनों व उपकरण खरीद कर लघु उद्योगों को किराया रसीद के आधार पर देता है
  • यह निगम उद्यमियों को नाम मात्र की राशि पर मशीनें व उपकरण उपलब्ध कराता हैं, केवल मशीनो की लागत का 10 से 15% तक ही उद्यमी को भुगतान करना होता है
  • इस निगम से सहायता लेने के लिए आपको किसी प्रकार की कोई जमानत राशि नहीं देनी होती है
  • निगम के द्वारा उद्यमी की फैक्ट्री में मशीनें व उपकरण स्थापित हो जाते हैं और कार्य निरंतर चलता रहता है किंतु उद्यमी इन उपकरणों को अपनी इच्छा अनुसार बेच नहीं सकता

3. राज्य लघु उद्योग निगम – State Small Industries Corporation

प्रत्येक राज्य सरकार अपने प्रांत में अधिक से अधिक उद्योग स्थापित कर विकास करना चाहती है
मुख्यालय राज्य लघु उद्योग निगम का कार्यालय हर राज्य की राजधानी या राज्य के सबसे बड़े औद्योगिक नगर में होता है अधिकांश औद्योगिक नगरों तथा जिला मुख्यालयों में इस निगम की शाखाएं व कार्यालय स्थापित किए गए हैं

राज्य लघु उद्योग के मुख्य उद्देश्य व कार्य

  • राज्य में स्थित लघु उद्योगों को दुर्लभ कच्चे माल की आपूर्ति करवाना
  • न्यूनतम दरों पर मशीनें दिलवाना
  • लघु उद्योगों को वित्तीय सुविधाएं उपलब्ध करवाना
  • प्रबंधकीय व तकनीकी जानकारी तथा सुविधाएं प्रदान करना
  • नए नए उद्योग क्षेत्रों की स्थापना एवं विकास कार्य करना
  • राज्य सरकार और उद्योग पतियों के साथ में उद्योग लगाने में सहायता प्रदान करना
  • लघु उद्योगों द्वारा तैयार माल के निर्यात और देश के विभिन्न भागों में बिक्री व वितरण की व्यवस्था में सहायता करना

4. उद्योग निदेशालय – Directorate of Industries

राज्य सरकारों द्वारा प्रत्येक जिले में उद्योग के विकास के लिए उद्योग निदेशालय (Directorate of Industries) के नाम से विशेष कार्यालय खोले गए हैं छोटे उद्यमियों को उद्योग निदेशालय से सहायता व सेवा प्राप्त करना बहुत आसान होता है

उद्योग निदेशालय के मुख्य उद्देश्य व कार्य

  • उद्योग निदेशालय का मुख्य उद्देश्य जिले में लगने वाले नए उद्योगों का पंजीकरण एवं रजिस्ट्रेशन करवाना होता है
  • नए उद्योगों के लिए भूमि व भवन आवंटित करना
  • मशीन व कच्चा माल खरीदने में उद्यमों की सहायता करना
  • नवीन उद्योगों के लिए रियायती दरों पर ऋण की व्यवस्था करना
  • नए औद्योगिक क्षेत्रों व Industrial Area की स्थापना तथा पुरानी इंडस्ट्री का विकास करना
  • कर्मचारियों व संचालकों के लिए विशिष्ट ट्रेनिंग प्रोग्राम का आयोजन भी उद्योग निदेशालय द्वारा किया जाता है
  • जिले में लघु उद्योगों द्वारा तैयार माल की बिक्री की व्यवस्था करना
  • बिक्री व वितरण कार्य हेतु मेलों व प्रदर्शनीयों में विशिष्ट बिक्री काउंटर की व्यवस्था करवाना
  • सहकारी संघों को तैयार माल सप्लाई करना

उद्योग निदेशालय का प्रधान कार्यालय राज की राजधानी में होता है एवं इसकी शाखाएं प्रत्येक संभाग में होती हैं

5. राज्य वित्तीय निगम – State Finance Corporation (SFC)

उपरोक्त सभी संगठनों का मुख्य कार्य उद्योगों का विकास करना होता है साथ ही ऋण की व्यवस्था भी उनका मुख्य कार्य है सभी राज्य सरकारों द्वारा अपने-अपने राज्य में छोटे व मध्यम आकार के उद्योगों को आसान शर्तो और कम ब्याज पर ऋण देने के लिए वित्त निगम की स्थापना की गई है

राज्य वित्त निगम के मुख्य उद्देश्य व कार्य

  • State Finance Corporation का एकमात्र कार्य है ग्रह और लघु उद्योगों को सभी व्यवसायिक कार्यो के लिए ऋण प्रदान करना है
  • यह वित्त निगम भूमि, भवन, मशीनों आदि की खरीदी के लिए दीर्घकालीन ऋण प्रदान करना
  • उद्योगों को सफलतापूर्वक चलाने के लिए संचालन व्यय, कच्चा माल खरीदने और सामान्य खर्चों के लिए अल्पकालीन ऋण भी प्रदान करते हैं
  • लघु उद्योगों द्वारा अन्य संस्थानों से लिए जाने वाले ऋण की गारंटी और ऋण पत्रों व स्टॉक पर ऋण सुविधाएं भी राज्य वित्त निगम देता है
  • कुछ क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग व निर्यात व्यापार में सहायता भी यह निगम प्रदान करते हैं

6. इंडस्ट्रियल क्रेडिट एंड इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन – Industrial Credit and Investment Corporation of India (ICICI)

केंद्र सरकार द्वारा स्थापित इंडस्ट्रियल क्रेडिट एंड इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन कच्चा माल खरीदने के लिए ऋण प्रदान करती है

इंडस्ट्रियल क्रेडिट एंड इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन के उद्देश्य व कार्य

  • यह निगम उद्योगों को कच्चा माल खरीदने के लिए ऋण देता है
  • यदि कोई माल सरकार को सप्लाई किया जाये या विदेशों में भेजा जाये तब उन बिलों के एवज में यह निगम ऋण देता है
  • इस कॉरपोरेशन का नए उद्योगों की स्थापना के लिए नहीं, बल्कि चलते हुए उद्योगों को कार्यकारी पूंजी के रूप में ऋण प्रदान करने का एकमात्र उद्देश्य है
  • जब कभी भी उद्योगों को कोई बड़ा ऑर्डर मिलता है तब उन उद्योगों को बड़ी मात्रा में कच्चे माल की आवश्यकता होती है ऐसे में यह निगम कच्चे माल की व्यवस्था करवाता है

7. भारतीय राज्य व्यापार निगम – State Trading Corporation of India (STC)

लघु उद्योगों को कच्चे माल के आयात और तैयार उत्पाद की बिक्री में सहायता प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 1956 में “भारतीय राज्य व्यापार निगम” को स्थापित किया गया था, लगभग सभी राज्यों के प्रत्येक जिले में इसकी शाखाएं हैं

भारतीय राज्य व्यापार निगम के उद्देश्य व कार्य

  • State Trading Corporation of India का मुख्य कार्य विदेशों से कच्चा माल आयात करके और भारतीय दुर्लभ रसायनों को खरीद कर पर्याप्त मात्रा में अपने भंडार करके रखना तथा आवश्यकता के समय उद्योगों को उपलब्ध करवाना है
  • स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन लघु उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं को अनेक देशों में निर्यात का कार्य भी करती है
  • यदि उद्योग ऐसी किसी वस्तु का उत्पादन करते हैं जिसे बनाने में आयातित कच्चे माल का प्रयोग होता है अथवा अपने उत्पाद को विदेशों में एक्सपोर्ट करना चाहते हैं तो यह निगम मदद करता है
  • निर्यात करते समय यदि उद्यमी को माल विदेशों में पहुंचाना पड़ता है, साथ ही आगे की सभी क्रियाएं भी निगम स्वयं ही करता है
  • निगम द्वारा स्वीकार किए गए माल के बिलों पर नाम मात्र का चार्ज लेकर Industrial Credit and Investment Corporation और व्यवसायिक बैंक तत्काल ही पेमेंट कर देते हैं

8. निर्यात संवर्धन परिषद – Export Promotion Council

भारत में 100 से अधिक निर्यात परिषदों की स्थापना की गई है विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के निर्यात के लिए कई प्रकार की अलग-अलग परिषदें हैं, राज्य व्यापार निगम सभी प्रकार की वस्तुओं का आयात निर्यात करती है, लेकिन निर्यात संवर्धन परिषद किसी एक वस्तु या अधिक से अधिक एक ही वर्ग की वस्तुओं का निर्यात करती है

निर्यात संबंधित परिषदों के उद्देश्य व कार्य

  • सभी प्रकार की वस्तुऐं जैसे काजू, चाय, जूता, हैंडलूम, रेडीमेड कपड़े आदि सभी वर्ग की वस्तुओं के निर्यात के लिए वस्तु से संबंधित परिषद हैं, जो निर्यात में मदद करती हैं अर्थात एक परिषद एक ही वस्तु अथवा एक ही वर्ग की वस्तुओं का निर्यात करती है
  • प्रत्येक परिषद अपने क्षेत्र में त्वरित सेवाएं देने में अधिक सामर्थ्य रखती है
  • ग्रह स्तर तक के छोटे उद्योग व ग्रामीण क्षेत्रों के उत्पादक अपनी बनाई वस्तुएं विदेशों में इन परिषदों के माध्यम से निर्यात कर सकते हैं

9. निर्यात ऋण गारंटी निगम – Export Credit Guarantee Corporation of India (ECGC)

उद्योगपति जिस विदेशी फर्म को माल भेजना चाहते हैं उसकी आर्थिक स्थिति और भुगतान क्षमता के बारे में आप इस निगम के माध्यम से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं यह निगम केंद्र सरकार द्वारा स्थापित किया गया है
ECGC बीमा कंपनी की तरह ही कार्य करता है

निर्यात ऋण गारंटी निगम के उद्देश्य व कार्य

  • यह निगम उद्यमियों को खरीदार के बारे में सभी सूचनाएं देने के साथ-साथ भेजे गए माल के भुगतान मिलने की गारंटी भी देता है
  • पेमेंट ना मिलने की दशा में निर्यातक को बिल के पेमेंट की वसूली की जवाबदारी लेता है तथा बाद में विदेशी खरीदार से स्वयं रकम प्राप्त करता रहता है
  • यह निगम स्वयं ऋण नहीं देता, लेकिन इस निगम द्वारा जिन बिलों की गारंटी ले ली जाती है, और उनके भुगतान बैंक समय से पूर्व ही अपना ब्याज काट कर दे देती है

10. व्यवसायिक एवं सहकारी बैंके – Commercial and Co-Operative Banks

व्यवसायिक एवं सहकारी बैंकों की स्थापना सभी प्रकार के उद्योगों को ऋण सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई हैं, उद्योगों और व्यापारियों के लिए ऋण लेने का सबसे बड़ा स्रोत बैंक ही है

व्यवसाय एवं सहकारी बैंकों के उद्देश्य व कार्य

  • बैंकों का मुख्य कार्य कम ब्याज पर जनता से पैसा एकत्रित करके अधिक ब्याज पर उसे दूसरे व्यक्तियों को प्रदान करना है
  • यह बैंक ग्रह और कुटीर उद्योगों को मशीनें खरीदने के साथ-साथ व्यवसाय चलाने तक के लिए आसानी से ऋण उपलब्ध करवाते है
  • यह बैंक सभी कुटीर उद्योगों, हथकरघा उद्योग, तकनीकी कौशल से युक्त एक्सपोर्ट कारीगर और अपना रोजगार प्रारंभ करने की इच्छुक महिलाओं तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के पढ़े-लिखे नवयुवकों को अत्यंत उदार शर्तों पर ऋण उपलब्ध करवाती है

FAQ

लघु उद्योग विकास संगठन का मुख्यालय कहां पर है ?

विकास आयुक्त लघु उद्योग विकास संगठन योगिक विकास एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय उद्योग भवन नई दिल्ली-110001

लघु उद्योग विकास संगठन किस मंत्रालय के अंतर्गत आता है ?

लघु उद्योग विकास संगठन सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आता है

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